वॉशिंगटन। अमेरिका में H-1B वीजा कार्यक्रम को लेकर ट्रंप प्रशासन ने निगरानी और सख्त करने की घोषणा की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए कार्यकारी आदेश के जरिए संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिया है कि H-1B वीजा के लिए आवेदन करने वाली कंपनियों की हालिया या प्रस्तावित छंटनी को भी जांच प्रक्रिया में शामिल किया जाए। इसके साथ ही कुछ नए H-1B वीजा मामलों पर 1 लाख डॉलर की फीस की व्यवस्था को अगले एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, नए आदेश का उद्देश्य H-1B कार्यक्रम में कथित दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है। आदेश के तहत विदेश विभाग, श्रम विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को H-1B आवेदनों की समीक्षा के दौरान यह भी देखना होगा कि संबंधित नियोक्ता ने पिछले एक साल में समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसी छंटनी की योजना बना रहा है।
प्रशासन का कहना है कि कुछ नियोक्ताओं और आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए किया गया है। व्हाइट हाउस ने दावा किया है कि इससे कुछ अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार और वेतन पर दबाव पड़ा है। हालांकि, ये प्रशासन के नीति संबंधी दावे हैं और H-1B कार्यक्रम की भूमिका को लेकर अमेरिकी कारोबार जगत में अलग-अलग मत भी मौजूद हैं।
नए आदेश में कई अमेरिकी एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने का भी निर्देश दिया गया है। विदेश विभाग, श्रम विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को वाणिज्य विभाग, शिक्षा विभाग और स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन से वेतन, रोजगार, उद्योग और अन्य श्रम बाजार संबंधी आंकड़े हासिल करने को कहा गया है। इसके अलावा अमेरिकी श्रम विभाग को पहले जमा किए गए Labor Condition Applications से जुड़े आंकड़ों की समीक्षा शुरू करने का निर्देश दिया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर प्रायोजक कंपनियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सके।
इसी बीच ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में शुरू की गई 1 लाख डॉलर की H-1B भुगतान आवश्यकता को भी एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। नई घोषणा के मुताबिक यह व्यवस्था 21 सितंबर 2027 तक जारी रखने का प्रावधान है और यह कुछ ऐसे नए H-1B कर्मचारियों पर लागू होती है जो अमेरिका के बाहर हैं और नए वीजा के आधार पर अमेरिका में प्रवेश करना चाहते हैं। मौजूदा H-1B धारकों और कुछ अन्य श्रेणियों के लिए अलग नियम लागू होते हैं।
हालांकि, 1 लाख डॉलर की फीस को लेकर कानूनी विवाद भी जारी है। एक अमेरिकी संघीय अदालत ने जून 2026 में सरकार की इस फीस व्यवस्था को रद्द कर दिया था और इसके बाद अपील अदालत में मामला चल रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक फिलहाल अदालत के आदेश के कारण इस फीस की वसूली पर कानूनी रोक बनी हुई है। इसलिए राष्ट्रपति की ओर से अवधि बढ़ाने की घोषणा और वास्तविक वसूली की स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है।
व्हाइट हाउस ने दावा किया है कि 2025 में फीस व्यवस्था लागू होने के बाद सबसे बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा दाखिल H-1B रजिस्ट्रेशन में 92 प्रतिशत की कमी आई। प्रशासन इसे कार्यक्रम में बदलाव के प्रभाव के तौर पर पेश कर रहा है। दूसरी ओर, कारोबारी संगठनों और कंपनियों की ओर से H-1B कार्यक्रम को तकनीकी और विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में प्रतिभा की जरूरत पूरी करने के लिए महत्वपूर्ण बताया जाता रहा है।
H-1B वीजा भारतीय पेशेवरों के लिए भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी देश रहा है और बड़ी संख्या में भारतीय IT और तकनीकी पेशेवर H-1B के जरिए अमेरिका में काम करते हैं। ऐसे में फीस, आवेदन की जांच और नियोक्ताओं की छंटनी से जुड़ी नई शर्तों का असर भारतीय पेशेवरों और अमेरिका में भर्ती करने वाली कंपनियों पर भी पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन के ताजा कदमों के बाद अब H-1B आवेदन प्रक्रिया में कंपनियों के रोजगार रिकॉर्ड, वेतन संबंधी जानकारी और अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी जैसे पहलुओं की जांच को अधिक महत्व मिलने की संभावना है। वहीं 1 लाख डॉलर की फीस को लेकर अदालतों में चल रही सुनवाई इस नीति की व्यावहारिक स्थिति के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है।
