रायपुर। सिंधी समाज की आस्था और परंपरा से जुड़े पवित्र चालीहा महोत्सव का शुभारंभ पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ हो गया है। इस अवसर पर क्षत्रिय करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष भाई वीरेंद्र सिंह तोमर ने सिंधी समाज के सभी भाई-बहनों को चालीहा महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं दीं।अपने शुभकामना संदेश में वीरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि 40 दिनों तक चलने वाली यह तपस्या, साधना और भक्तिभाव से की जाने वाली आराधना व्यक्ति के जीवन में शांति, संयम और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती है। यह पर्व हमें आस्था के साथ-साथ अनुशासन, त्याग और मानव कल्याण का मार्ग भी दिखाता है।उन्होंने कहा कि चालीहा महोत्सव केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सिंधी समाज की समृद्ध संस्कृति, विश्वास और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इस पर्व के माध्यम से श्रद्धालु अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प लेते हैं।
रायपुर से लेकर विदेशों तक गूंज रही भक्ति की भावना
ज्ञात हो कि चालीहा महोत्सव का शुभारंभ 16 जुलाई, गुरुवार को हुआ। महोत्सव शुरू होते ही रायपुर सहित देश-विदेश में बसे सिंधी समाज के लोगों ने विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत कर दी है।श्रद्धालु पूरे नियम और श्रद्धा के साथ भगवान झूलेलाल एवं भगवान वरुण देव की आराधना कर रहे हैं। मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भी विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
व्यसन मुक्ति और प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है चालीहा पर्व
वीरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि चालीहा महोत्सव के दौरान किए जाने वाले व्रत और साधना व्यक्ति को आत्मसंयम की सीख देते हैं। यह पर्व जीवन में बुरी आदतों और व्यसनों से दूर रहने की प्रेरणा देता है।उन्होंने कहा कि चालीहा महोत्सव का एक महत्वपूर्ण संदेश जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान भी है। सिंधी समाज भगवान वरुण देव की आराधना के माध्यम से नदियों और जल स्रोतों के महत्व को समझाता है। छोटी-बड़ी सभी नदियों के संरक्षण का संदेश इस पर्व से जुड़ा हुआ है।
चालीहा महोत्सव में निभाई जाती हैं कठिन साधनाएं
चालीहा महोत्सव के दौरान श्रद्धालु कठिन नियमों और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। मान्यता के अनुसार इस अवधि में कई भक्त:
बालों में कंघी नहीं करते।
दाढ़ी और बाल नहीं कटवाते।
जूते-चप्पल का त्याग करते हैं।
जमीन पर विश्राम करते हैं।
ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
इसके अलावा महोत्सव के शुरुआती नौ दिन या अंतिम नौ दिनों में व्रत रखने की परंपरा भी है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन या प्रसाद ग्रहण करते हैं।
भगवान झूलेलाल के अवतरण से जुड़ी है धार्मिक मान्यता
चालीहा महोत्सव की पौराणिक मान्यता सिंधी समाज के आराध्य देव भगवान झूलेलाल और भगवान वरुण देव से जुड़ी हुई है।धार्मिक कथाओं के अनुसार करीब एक हजार वर्ष पहले सिंध क्षेत्र में मिरख बादशाह का शासन था, जो अपने अत्याचारों के लिए जाना जाता था। उसके अत्याचारों से परेशान लोगों ने सिंधु नदी के किनारे भगवान वरुण देव की 40 दिनों तक कठिन आराधना की।
मान्यता है कि श्रद्धालुओं की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान वरुण देव ने उन्हें संकट से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया। कहा जाता है कि उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि वे रतन राय के घर जन्म लेकर समाज के दुखों का अंत करेंगे।इसके बाद वर्ष 991 में सिंध प्रांत के नसरपुर नगर में रतन राय के घर चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया। आगे चलकर यही बालक भगवान झूलेलाल के रूप में प्रसिद्ध हुए और उन्होंने सिंधी समाज को अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।
आस्था, संस्कृति और एकता का महापर्व है चालीहा
चालीहा महोत्सव सिंधी समाज के लिए श्रद्धा, विश्वास और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण पर्व है। 40 दिनों तक चलने वाली यह साधना भक्तों को संयम, सेवा, भक्ति और सद्भावना का संदेश देती है।वीरेंद्र सिंह तोमर ने इस अवसर पर समाज के सभी लोगों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हुए कहा कि ऐसे धार्मिक पर्व समाज को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं।
