पटना | विशेष रिपोर्ट
बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव इस बार सबसे चर्चित मुकाबलों में से एक बनता जा रहा है। तीन दशक से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मजबूत गढ़ के रूप में पहचान रखने वाली इस सीट पर अब जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) ने चुनावी मैदान में उतरकर मुकाबले को नई दिशा दे दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पीके बांकीपुर की वर्षों पुरानी चुनावी तस्वीर बदल पाएंगे या फिर बीजेपी का विजय रथ पहले की तरह जारी रहेगा।
30 वर्षों से बीजेपी का अभेद्य किला
बांकीपुर विधानसभा पर वर्ष 1995 से बीजेपी का लगातार कब्जा रहा है। 2008 के परिसीमन के बाद यह सीट बांकीपुर विधानसभा बनी, लेकिन राजनीतिक समीकरण नहीं बदले। 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के नितिन नवीन ने लगातार जीत दर्ज की और विपक्ष को कभी भी मजबूत चुनौती नहीं मिल सकी।
इन तीनों चुनावों में बीजेपी को लगभग 59 से 62 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांग्रेस और राजद जैसे विपक्षी दल 29 से 32 प्रतिशत वोटों के बीच ही सिमटे रहे। इससे साफ है कि बांकीपुर में बीजेपी का जनाधार वर्षों से मजबूत बना हुआ है।
कम मतदान बना सबसे बड़ी चुनौती
बांकीपुर की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यहां का कम मतदान प्रतिशत है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में मतदान 35 से 41 प्रतिशत के बीच ही रहा। यानी करीब 60 प्रतिशत मतदाता मतदान प्रक्रिया से दूर रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाताओं की उदासीनता और विकल्पों की कमी इसकी प्रमुख वजह रही है।
प्रशांत किशोर की एंट्री से बदलेगा समीकरण?
इस बार प्रशांत किशोर ने खुद चुनावी मैदान में उतरकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। पीके का दावा है कि बांकीपुर में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता हैं जो न बीजेपी को वोट देना चाहते हैं और न ही राजद को। जन सुराज इन्हीं मतदाताओं को तीसरा विकल्प देने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर मतदान से दूर रहने वाले मतदाताओं को बूथ तक लाने में सफल होते हैं, तो बांकीपुर की चुनावी तस्वीर बदल सकती है। हालांकि बीजेपी के मजबूत संगठन और वर्षों से कायम जनाधार को चुनौती देना उनके लिए आसान नहीं होगा।
क्या बदलेगा चुनाव का इतिहास?
बांकीपुर उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति की भी परीक्षा माना जा रहा है। यदि प्रशांत किशोर यहां वोट प्रतिशत बढ़ाने और नए सामाजिक समीकरण बनाने में सफल होते हैं, तो यह उनके लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी। वहीं यदि बीजेपी एक बार फिर आरामदायक जीत दर्ज करती है, तो यह साबित होगा कि बांकीपुर आज भी उसके सबसे मजबूत गढ़ों में से एक है।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रशांत किशोर तीन दशक पुराने राजनीतिक समीकरण को बदल पाएंगे या फिर बांकीपुर एक बार फिर बीजेपी के नाम ही रहेगा।
