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अमित शाह और राहुल गांधी के खिलाफ FIR की मांग खारिज, दिल्ली हाई कोर्ट बोला- कानून लागू करना सरकार का नीतिगत फैसला

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 106(दा) को लागू नहीं करने के मुद्दे पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कानून के प्रावधान को लागू करना केंद्र सरकार का नीतिगत निर्णय है और इस संबंध में अधिसूचना जारी करने का अधिकार भी सरकार के पास ही है।मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक केंद्र सरकार किसी प्रावधान को लागू करने के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं करती, तब तक न्यायालय उस प्रावधान को लागू करने या उसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के निर्देश नहीं दे सकता।

राजनीतिक मुद्दा बनाने से बचने की सलाह

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एवं अधिवक्ता रितु गौबा ने अपनी दलीलों में राजनीतिक संदर्भ और विभिन्न नेताओं का उल्लेख किया। इस पर अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए। पीठ ने कहा कि न्यायालय केवल कानूनी पहलुओं पर विचार करता है, इसलिए बहस भी कानून के दायरे में ही होनी चाहिए।

सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी कानून के प्रावधान को लागू करने का निर्णय पूरी तरह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह सरकार का नीतिगत फैसला है कि किसी प्रावधान को कब और किन परिस्थितियों में अधिसूचित किया जाए। ऐसे मामलों में न्यायालय सरकार को अधिसूचना जारी करने का निर्देश नहीं दे सकता।पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संबंधित धारा प्रभावी रूप से लागू नहीं होती, तब तक उसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

याचिका हुई खारिज

इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि बिना अधिसूचना के किसी कानूनी प्रावधान को लागू कराने की मांग न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आती।

इस फैसले के साथ हाई कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया संविधान और विधिक व्यवस्था के तहत सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि न्यायालय का कार्य उन कानूनों की वैधता और उनके अनुपालन से जुड़े विवादों का निपटारा करना है। इसलिए केवल अधिसूचना जारी न होने के आधार पर सरकार या किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आदेश नहीं दिया जा सकता।

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