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‘दोस्त अखिलेश’ से बदले सियासी समीकरण तक: तीन महीने में महिला आरक्षण पर बदला सपा का रुख, यूपी चुनाव से पहले नई रणनीति

लखनऊ/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव का रुख पहले के मुकाबले बदला हुआ नजर आ रहा है। जिस महिला आरक्षण विधेयक को लेकर अप्रैल में संसद के भीतर सपा ने सरकार को घेरा था, अब उसी मुद्दे पर पार्टी समर्थन की बात कर रही है। हालांकि, यह समर्थन बिना शर्त नहीं है। अखिलेश यादव ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें भी रखी हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की चर्चा इसलिए भी तेज हो गई है क्योंकि करीब तीन महीने पहले, 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में हल्के-फुल्के अंदाज में अखिलेश यादव को अपना “दोस्त” बताते हुए विपक्ष से सहयोग की अपील की थी। उस वक्त प्रधानमंत्री ने कहा था कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर महिला सशक्तिकरण के लिए सभी दलों को साथ आना चाहिए।

लेकिन उस समय समाजवादी पार्टी ने सरकार का साथ नहीं दिया। संसद में अखिलेश यादव और सपा सांसदों ने बिल को लेकर कई सवाल उठाए। उनका कहना था कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ना उचित नहीं है। साथ ही उन्होंने पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग प्रतिनिधित्व की भी मांग की थी।

अब क्यों बदला सपा का रुख?

लोकसभा के आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर फिर से चर्चा की संभावना के बीच समाजवादी पार्टी का रुख बदला हुआ दिखाई दे रहा है। महिला संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार जल्द मिलना चाहिए और महिला आरक्षण को तत्काल लागू किया जाना चाहिए।

हालांकि, उन्होंने सरकार के सामने तीन अहम शर्तें भी रखीं—

  • महिला आरक्षण में PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) वर्ग की महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  • आरक्षण लागू करने में अनावश्यक देरी न हो और इसे जल्द प्रभावी बनाया जाए।
  • लोकसभा और विधानसभा तक ही नहीं, बल्कि राज्यसभा और विधान परिषद जैसी संस्थाओं में भी महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए।
यूपी चुनाव से जोड़कर देखे जा रहे हैं सियासी मायने

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले महिला मतदाताओं को साधना सभी दलों की प्राथमिकता बन चुकी है। पिछले कुछ चुनावों में महिला वोटरों की निर्णायक भूमिका रही है। ऐसे में समाजवादी पार्टी भी महिलाओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।

सपा का यह बदला हुआ रुख इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि अप्रैल में पार्टी लगातार सरकार पर महिला आरक्षण को लेकर हमला बोल रही थी। अखिलेश यादव ने तब भाजपा पर आरोप लगाया था कि सरकार महिलाओं के सम्मान से ज्यादा चुनावी राजनीति पर ध्यान दे रही है।

क्या बदलेंगे सियासी समीकरण?

महिला आरक्षण के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी का नया रुख आगामी संसद सत्र और उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि सरकार और विपक्ष के बीच इन मांगों को लेकर सहमति बनती है तो संसद में इस मुद्दे पर नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिल सकते हैं। वहीं, यूपी चुनाव से पहले महिलाओं और PDA वर्ग को साधने की कोशिशें भी और तेज होने की संभावना है।

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