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रायपुर बना आध्यात्म का केंद्र, 71 साल बाद खरतरगच्छ परंपरा को मिला नया आचार्य

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर आज आध्यात्म, तप और त्याग की अनुपम आभा से आलोकित हो उठी। बूढ़ापारा इंडोर स्टेडियम में आयोजित जैन समाज के ऐतिहासिक आचार्य पदारोहण महोत्सव में विनय कुशल मुनि को खरतरगच्छ परंपरा के नए आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। इस अवसर को विशेष बनाते हुए 71 वर्षों बाद किसी संत को यह सर्वोच्च पद प्रदान किया गया है, जिससे देशभर के जैन समाज में उत्साह और श्रद्धा का वातावरण है।देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने रायपुर पहुंचे। समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता की।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आज रायपुर की धरती आध्यात्म की धरती बन गई है। उन्होंने कहा कि आचार्य कोई मात्र पद नहीं, बल्कि तप, त्याग, साधना और आत्मसंयम की सर्वोच्च साधना का प्रतीक है। जैन संतों ने सदैव समाज को शांति, अहिंसा और मानवता का संदेश दिया है।

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने इसे छत्तीसगढ़ के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताते हुए कहा कि त्याग, तपस्या और आत्मज्ञान का ऐसा अद्भुत उदाहरण दुर्लभ है। उन्होंने विरागमुनि महाराज की 169 दिनों तक केवल गर्म पानी पर आधारित तपस्या का उल्लेख करते हुए इसे असाधारण आत्मसंयम की मिसाल बताया।मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि इतने बड़े संतों और महापुरुषों की उपस्थिति से पूरा छत्तीसगढ़ धन्य हुआ है। उन्होंने संत समाज से प्रदेश की सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए आशीर्वाद प्रदान करने का आग्रह किया।

महोत्सव के दौरान धार्मिक अनुष्ठान, मंगल पाठ, पूजा-विधि और जयघोषों से पूरा परिसर भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने इस अवसर को अपने जीवन का सौभाग्य बताते हुए बड़ी संख्या में सहभागिता की।महोत्सव के दूसरे दिन हंसभद्र मुनिजी ने अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति का प्रदर्शन करते हुए सहस्त्रावधान की अद्भुत प्रस्तुति दी। उन्होंने एक हजार शब्दों को याद रखकर क्रमवार प्रस्तुत किया, जिसकी उपलब्धि को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है।

26 साधुओं और 16 साध्वियों की पावन निश्रा में आयोजित यह तीन दिवसीय महोत्सव धर्म, तप, साधना और भक्ति का अद्वितीय संगम बना हुआ है। रायपुर में आयोजित यह ऐतिहासिक आयोजन जैन समाज के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो रहा है।

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