लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी (सपा) पिछले एक दशक से सत्ता का वनवास झेल रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव सूबे की सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं, लेकिन आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के भीतर से ही सिर उठा रही गुटबाजी और कलह ने उनकी चिंताएं बढ़ा दी हैं। ताजा मामला सपा की तीन दिग्गज और तेजतर्रार महिला सांसदों का है, जिनकी अपनी ही पार्टी के विधायकों के साथ राजनीतिक वर्चस्व की जंग छिड़ गई है। यह अंदरूनी अदावत अब खुलकर सड़कों और पार्टी के मंचों पर दिखने लगी है।
1. मुरादाबाद: रुचि वीरा बनाम कमाल अख्तर (अखिलेश को करना पड़ा हस्तक्षेप)
पश्चिम यूपी के मुरादाबाद में लोकसभा सांसद रुचि वीरा और जिले की कांठ विधानसभा सीट से सपा विधायक कमाल अख्तर के बीच की सियासी रार किसी से छिपी नहीं है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से ही दोनों नेताओं के बीच वर्चस्व की जंग शुरू हुई थी, जो समय के साथ और गहरी होती चली गई। सांसद और विधायक के बीच छिड़ी इस सियासी अदावत और गुटबाजी का असर संगठन पर न पड़े, इसके लिए खुद अखिलेश यादव को एक्शन मोड में आना पड़ा है। मुरादाबाद में पार्टी दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है, जिससे स्थानीय कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति है।
2. मछलीशहर (जौनपुर): प्रिया सरोज बनाम रागिनी सोनकर (दो युवा चेहरों में रार)
जौनपुर की मछलीशहर लोकसभा सीट पर सपा की दो युवा, शिक्षित और तेजतर्रार महिला नेताओं के बीच शह-मात का खेल चल रहा है। यहां से 2024 में लोकसभा सांसद चुनी गईं प्रिया सरोज, सपा के दिग्गज नेता तूफानी सरोज की बेटी हैं। वहीं, इसी क्षेत्र की मछलीशहर विधानसभा सीट से डॉ. रागिनी सोनकर 2022 से सपा की विधायक हैं। दोनों ही नेता अपने-अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखती हैं और युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लेकिन अब इस वीआईपी सीट पर स्थानीय राजनीति और श्रेय लेने की होड़ में दोनों के बीच ‘शीतयुद्ध’ छिड़ गया है, जो पार्टी के लिए आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकता है।
3. बुंदेलखंड: महिला सांसद और विधायकों में कलह
बीते 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बुंदेलखंड क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करते हुए तीन सीटें जीती थीं, जिससे पार्टी को संजीवनी मिली थी। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बुंदेलखंड में भी सपा की महिला सांसद और स्थानीय विधायकों के बीच अंदरूनी कलह सामने आ रही है। यहां भी वर्चस्व, संगठन पर नियंत्रण और स्थानीय कार्यक्रमों में अनदेखी को लेकर खींचतान मची हुई है।
- अखिलेश यादव के सामने बड़ी चुनौती
2027 में यूपी की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही समाजवादी पार्टी के लिए घर की यह फूट भारी पड़ सकती है। एक तरफ जहां अखिलेश यादव महिला सशक्तिकरण और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर महिला सांसदों और स्थापित विधायकों के बीच का यह टकराव पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते अखिलेश यादव ने इन सभी गुटों को बिठाकर बीच का रास्ता नहीं निकाला, तो यह अंदरूनी गुटबाजी 2027 के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ सकती है।
