नई दिल्ली। तमिलनाडु के चर्चित करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) को बड़ा झटका देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मुख्यमंत्री विजय को हादसे के पीड़ित परिवारों से मिलने, आर्थिक सहायता देने और नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपने से रोकने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी मुख्यमंत्री की सार्वजनिक गतिविधियों या प्रशासनिक निर्णयों को तय करना न्यायालय का काम नहीं है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को राजनीतिक विवादों का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि किसी राजनीतिक दल को सरकार या मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर आपत्ति है, तो उसका जवाब राजनीतिक स्तर पर दिया जाना चाहिए, न कि न्यायालय के माध्यम से।
- “राजनीतिक लड़ाई कोर्ट में नहीं लड़ी जा सकती”
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि यदि सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के नेता किसी घटना को लेकर सार्वजनिक बयान दे रहे हैं, तो विपक्षी दल भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख सकते हैं। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के राजनीतिक मतभेदों का समाधान न्यायिक हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।
- पीड़ित परिवारों को मुआवजा और नौकरी देंगे मुख्यमंत्री विजय
मुख्यमंत्री विजय करूर हादसे में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिजनों से मुलाकात कर प्रत्येक परिवार को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता तथा एक सदस्य को सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र सौंपने वाले हैं। इसी प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर डीएमके ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि मुख्यमंत्री की यह पहल मामले की जांच को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि हादसे की जांच अभी जारी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी।
- क्या है करूर भगदड़ मामला
सितंबर 2025 में करूर में आयोजित तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की एक विशाल रैली के दौरान अचानक भगदड़ मच गई थी। इस दर्दनाक हादसे में 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य घायल हुए थे। घटना के बाद पूरे राज्य में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी।
शुरुआत में मामले की जांच विशेष जांच दल (SIT) को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जांच राज्य पुलिस से लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी। मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए अदालत की निगरानी में एक विशेष समिति भी जांच प्रक्रिया पर नजर रख रही है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायपालिका और कार्यपालिका की संवैधानिक सीमाओं को स्पष्ट करता है। अदालत ने यह संकेत दिया है कि जब तक किसी कार्रवाई से जांच या न्यायिक प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने का ठोस आधार न हो, तब तक किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद मुख्यमंत्री विजय का करूर दौरा तय कार्यक्रम के अनुसार होने का रास्ता साफ हो गया है। अब वे पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र वितरित करेंगे। इस फैसले को तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
